डीएमके के बॉस बने स्टालिन, पर भाई हैं सबसे बड़ी चुनौती

इसके अलावा राज्य में रोज बदलते राजनीतिक समीकरण भी स्टालिन के लिए बहुत बड़ी चुनौती हैं. वैसे तो स्टालिन की राजनीतिक राह खुद करुणानिधि ने प्रशस्त की थी. उन्होंने वाइको जैसे अपने विश्वासपात्र को बेटे के लिए पीछे ढकेल दिया था. स्टालिन के लिए राजनीतिक राह खोलने के लिए करुणानिधि ने वाइको की सेवाओं को भी दरकिनार कर दिया था. इसके बावजूद कभी भी उन्होंने स्टालिन को पूरी तरह से छूट नहीं दी थी. अब स्टालिन पूरी तरह से डीएमके के बॉस बन गए हैं.

यह अलग बात है कि करुणानिधि के फैसले का उनके जीवित रहते ही एमके अलागिरी ने विरोध किया था. इसके कारण स्टालिन और अलागिरी में विवाद भी हुआ. इस पर 2014 में करुणानिधि ने खुद बेटे को पार्टी से निकाल दिया था. अब जब करुणानिधि नहीं रहे तो जाहिर है कि स्टालिन के अलागिरी सबसे बड़ी चुनौती बनकर सामने आएंगे. यहां तक कि अलागिरी ने पांच सितंबर को एक बड़ी रैली बुलाई है. इसमें वह अपनी राजनीतिक नीति का खुलासा कर सकते हैं.

इस रैली में अलागिरी ने नई पार्टी बनाने की घोषणा की तो साफ है कि उन्हें स्टालिन के विरोधियों का साथ मिल जाएगा. अगर ऐसा हुआ तो तमिलनाडु में स्टालिन को बड़ा नुकसान होगा. इसका कारण है कि अलागिरी बड़े हैं और खुद को करुणानिधि का उत्तराधिकारी बताते रहे हैं. राज्य में वोटरों के एक बड़े तबके की सहानुभूति भी इसी कारण से उनके साथ है.

ऐसी स्थिति में स्टालिन के सामने चुनौती होगी कि किस तरह से पिता की विरासत को आगे ले जाते हैं. उन्हें खुद को साबित करना होगा, जिसकी राह इतनी आसान नहीं है. सिर्फ करुणानिधि का बेटा होने के नाते पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं का सम्मान तो उन्हें मिल रहा है, पर पार्टी को सत्ता में लौटाने की चुनौती भी उनके सामने है. वह भी तब, जब भाजपा दक्षिण में पैर पसार रही है. रजनीकांत और कमल हासन जैसे अभिनेता भी राजनीति में कूद चुके हैं. खुद करुणानिधि भी फिल्मी दुनिया से राजनीति में आए थे. वैसे भी दक्षिण में फिल्मी सितारों का राजनीति में हमेशा से वर्चस्व रहा है. करुणानिधि ही नहीं, भूतपूर्व मुख्यमंत्री जयललिता भी फिल्मों से ही राजनीति में आई थीं.

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