हिन्दू और हिंदी विरोध से करुणानिधि को मिली पहचान, भगवान राम पर दिया था ये बयान

मिशन-2019 में आपका स्वागत है। आम चुनाव-2019 होने में 10 महीने बाकी हैं। लेकिन लोकसभा चुनाव-2019 से पहले एम करुणानिधि का निधन राजनीति पर बड़ी चोट है। करुणानिधि को हिंदी विरोध के चलते तमिलनाडु में पहली पहचान मिली। इस विरोध से वे सिर्फ डीएमके के दमदार नेता ही बने बल्कि तमिलनाडु के मुख्यमंत्री भी बने। इतना ही नही दक्षिण भारत की राजनीति में हिंदी विरोध एक बड़ा मुद्दा है, ये वो अच्छी तरह से समझ चुके थे। करुणानिधि ने हिंदू देवी-देवताओं के अस्तित्व पर भी तार्किक प्रश्न पूछे। राम सेतु को लेकर उनका बयान था कि क्या राम इंजीनियर थे?

करुणानिधि ने हिंदी का विरोध किया ये सब जानते हैं लेकिन वो सिर्फ यहीं नहीं रुके उन्होंने संस्कृत का भी विरोध करने का मन बना लिया, जिसे दक्षिण भारत की भाषाओं की जननी भाषा माना जाता है। उन्होंने अपने विरोध प्रदर्शन के लिए आंदोलनों में शिरकत लेना शुरू कर दिया।

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उत्तर भारत के उद्योगपति रामकृष्ण डालमिया ने कालाकुडी में सीमेंट की फैक्ट्री खुलवाई थी। इससे इलाके के लोगों को रोजगार मिलने लगा। दोस्तों डालमिया इस कदम को सम्मान देने के लिए कालाकुडी का नाम डालमियापुरम कर दिया गया। डीएमके ने इसका कड़ा विरोध किया। करुणानिधि डीएमके समर्थकों के साथ वहां पहुंच गए और डालमियापुरम रेलवे स्टेशन के बोर्ड को काले रंग से पोत दिया क्योंकि उनका नाम हिंदी से लिखा था।

ये विरोध प्रदर्शन जबरदस्त था। करुणानिधि ने रेल की पटरियां उखाड़ी और पटरियों पर लेट गए। ये प्रदर्शन घंटों चला। इस विरोध को स्थानीय लोगों का भी काफी समर्थन मिला। इस विरोध में करुणानिधि को गिरफ्तार भी होना पड़ा पर उनका विरोध सफल रहा क्योंकि डालमियापुरम नाम बदलकर फिर से कालाकुडी हो गया। हिंदी विरोध से उन्होंने एक नई सफलता हासिल की।

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