अब दिल की बीमारी का पहले ही पता चल जाएगा, 70 साल बाद डॉक्टरों ने खोजा नायाब तरीका

शोधकर्ताओं ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण खोज किया है। लंबे रिसर्च के बाद डॉक्टरों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की गई है जो दिल की बीमारी जैसे गंभीर बीमारी होने की संभावनाओं से आपको सालों पहले ही अवगत करा देगी।

भारत जैसे देश में जहां दिल की बीमारी के कारण हर साल 1.7 मिलियन जिंदगी खत्म होती है, ऐसे में यह एक क्रांतिकारी बदलाव साबित होगा। जी हां- 70 सालों के बाद डॉक्टरों को बड़ी कामयाबी मिली है। 70 सालों के लंबे अध्ययन के बाद डॉक्टरों ने एक ऐसा उपकरण बनाया है जो आपको भविष्य में होने वाले दिल की बीमारियों की जानकारी देगा।

मैसाचुसेट्स के फ्रामिंघम में दिल की बीमारी के विषयों पर लंबे अध्ययन के बाद इस उपकरण को बनाया गया है जिसे आमतौर पर फ्रामिंघम कार्डियोवासकुलर रिस्क स्केल कहा जाता है। सालों पहले इसे अमेरिका के लोगों के लिए बनाया गया था। अंतर्राष्ट्रीय सॉफ्टवेयर कंपनी और अस्पतालों की श्रृंखला चलाने वाली माइक्रोसॉफ्ट कॉरपोरेशन ने ऐसा ही एक उपकरण भारत के अस्पतालों में उपलब्ध करवा रही।

अपोलो ग्रुप ऑफ हॉस्पिटल ने 2010 से 2017 के बीच चार लाख मरीजों की स्वास्थ्य जांच संबंधित जानकारी माइक्रोसॉफ्त को सौंपी। जिस पर आर्टिफिसियल इंटेलिजेंस की मदद से अध्ययन के बाद इस उपकरण को विकसित किया गया है। अपोलो अस्पताल के ह्रदय रोग विषेशज्ञ डॉ. जे शिव कुमार बताया कि 31,000 मरीजों की जांच रिपोर्ट के आधार पर हमने 21 अंकों का एक स्केल बनाया है जो किसी मरीज को भविष्य में होने वाले ह्रदय रोग का अनुमान लगाएगा। उन्होंने बताया कि इन स्केल्स का आपोलो अस्पतालों में ट्रायल के तौर पर इस्तमाल किया जा रहा है।

माइक्रोसॉफ्ट इंडिया प्रा. लि. के अनिल भंसाली ने कहा कि भारतीय राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य अध्ययन के अनुसार भारत में प्रत्येक 8 में से 1 व्यक्ति को हाई ब्लड प्रेसर की समस्या है। भारत में ह्रदय रोग के अनगिनत मामलों के बावजूद डॉक्टर उनकी बीमारियों का अनुमान लगाने में असमर्थ हैं। जबकि मरीज नियमित रूप से जांच करवाते हैं।

इस वजह से अपोलो और माइक्रोसॉफ्ट ने मिल कर इस गंभीर समस्य से निपटने के लिए काम शुरू किया। इस संयुक्त परियोजना का उद्देश्य आर्टिफिसियल इंटेलीजेंस और क्लिनिकल विशेषज्ञता की मदद से एक ऐसी प्रणाली विकसित करनी थी जिससे इन बीमारियों का अनुमान लगाया सके। उन्होंने बताया कि फ्रेमिंघम की तुलना में हमारा यह स्केल बेहतर काम कर रहा है। फ्रेमिंघम स्केल की एक्युरेसी लगभग 31 प्रतिशत है जब कि हमारे स्केल की एक्युरेसी 67 प्रतिशत के करीब है।

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