क्या आपको पता है बेगम जीनत महल की हवेली का दुख!

दिल्ली के तमाम ऐतिहासिक इमारतों में जिस एक इमारत की सबसे ज्यादा उपेक्षा हुई, वह है चांदनी चौक के लालकुआ इलाके के फराशखाना में स्थित बेगम जीनत महल की हवेली। इस महल के साथ 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम की बेशुमार यादें जुडी हैं।

इस महल को आखिरी मुग़ल बादशाह, शायर और स्वतंत्रता सेनानी बहादुर शाह जफ़र की तीसरी और उनकी सबसे प्रिय बेगम जीनत महल ने 1846 में बनवाया था।

लगभग छह एकड़ क्षेत्र में बनी अपने विशाल और अभेद्य दरवाजों, खूबसूरत झरोखों, जालीदार खिडकियों और दीवारों पर बेहतरीन चित्रांकन वाली मुग़ल स्थापत्य शैली की यह हवेली उस दौर में लाल किले के बाद चांदनी चौक क्षेत्र की सबसे बड़ी और चर्चित हवेली हुआ करती थी। इस हवेली को लाल किले से जोड़ने वाली दो सुरंगें भी बनी थीं जो कालान्तर में बंद कर दी गईं।

बेगम जीनत महल.लाल किले में रहने की बजाय अधिकतर समय फराशखाने के अपने इसी महल में रहीं। यह तो सबको पता है कि अपने बुढापे और जर्जर देह की वज़ह से जफ़र की रूचि राजकाज में कम और शायरी में ज्यादा रही थी। शासन की बागडोर अप्रत्यक्ष रूप से जीनत महल के हाथों में ही थी। उस वक़्त मुगल शासन का केंद्र लाल किले से ज्यादा बेगम जीनत महल का यही महल हुआ करता था। आज अपना पुराना गौरव खोकर यह ऐतिहासिक हवेली गुमनामी का अभिशाप झेल रही है।

1857 के स्वाधीनता संग्राम के नायक बहादुर शाह जफ़र को तो सब जानते हैं, लेकिन उनकी बेगम ज़ीनत महल की भूमिका आमतौर पर लोगों की नज़रों से ओझल ही रही है। बेगम ज़ीनत ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों में स्वतंत्रता सेनानियों को संगठित और उन्हें उत्साहित करने में बड़ी भूमिका निभाई थी। क्रांति के दौरान अंग्रेजी सेना की ताक़त देख जब बहादुर शाह हिम्मत हारने लगे तो उनमें नई जान फूंकने वाली जीनत महल ही थी।

बेगम ने उन्हें ललकारते हुए कहा था – ‘यह समय ग़ज़लें कह कर दिल बहलाने का नहीं है। बिठूर से नाना साहब का पैग़ाम लेकर देशभक्त सैनिक आए हैं। आज सारे हिन्दुस्तान की आंखें दिल्ली की ओर और ख़ासकर आप पर लगी हैं। ख़ानदान-ए-मुग़लिया के ख़ून ने अगर हिन्द को ग़ुलाम होने दिया तो इतिहास उसे कभी क्षमा नहीं करेगा।”

युद्ध के दौरान चारों ओर से घिर जाने के बाद हताश बादशाह को बेगम ने सलाह दी थी कि वे अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण न कर उनके खिलाफ लड़ाई ज़ारी रखें। संसाधनों की कमी की वज़ह से बहादुर शाह ऐसा नहीं कर सके। उन्हें डर था कि लड़ाई आगे बढ़ी तो और अधिक खून-खराबा होगा। अंततः बहादुर शाह और जीनत महल ने अलग-अलग रास्तों से लालकिला छोड़ने का फैसला किया। एक नाव से यमुना से होते हुए बहादुर शाह निजामुद्दीन औलिया की दरगाह और फिर हुमायूं के मकबरे में पहुंचे जहां से उनकी गिऱफ्तारी हुई।

बहादुर शाह को हुमायूं के मकबरे से लाने के बाद जीनत महल की इसी हवेली में रखा गया था। उस दौर के दस्तावेजों से पता चलता है कि यहां अंग्रेजों ने उनके साथ बेहद अमानवीय सलूक किया। उस समय के सिविल कमिश्नर साडर्स की पत्नी मेटिल्डा ने लिखा है कि उसने हवेली में आखिरी मुगल बादशाह को दालान में एक टूटी सी चारपाई पर सिर झुकाए चुपचाप बैठे देखा था। एक ब्रिटिश सैनिक द्वारा दिए गए विवरण के मुताबिक बूढ़ा बादशाह शासक की तरह नहीं, किसी खिदमतगार की तरह दिख रहा था। उनसे मिलने के लिए किसी को जूते उतारने की भी जरूरत नहीं थी। बादशाह को देखकर अंग्रेज सैनिक उनका मज़ाक उड़ाते थे और उन्हें हर तमाशबीन को सलाम करने के लिए मजबूर करते थे। संक्षिप्त मुकदमे के बाद बहादुर शाह को सजा के तौर पर रंगून जेल भेजने का फैसला किया गया, लेकिन जीनत महल को अंग्रेज हुकूमत ने देश में ही रहने की छूट दे दी। जीनत ने अकेली रहने के बजाय पति के साथ रंगून जेल जाना पसंद किया। अंग्रेजों में बेगम जीनत के लिए इतनी नफरत थी कि उनके जाते ही उन्होंने हवेली के कई खूबसूरत हिस्सों को तोड़ डाला। जफ़र की तरह बेगम ने भी रंगून जेल में ही अंतिम सांस ली। आज भी उनकी कब्र रंगून में बहादुर शाह जफर की कब्र के साथ मौजूद है।

कभी दिल्ली में भारतीय स्वाधीनता संग्राम का केंद्र रही जीनत महल की यह ऐतिहासिक हवेली आज अपने अस्तित्व की शायद आखिरी लड़ाई लड़ रही है। अपने वर्तमान स्वरुप में इसे पहचानना भी मुश्किल है। महल के अधिकांश हिस्से पर अवैध कब्जा हो चुका है। हर जगह छोटी-मोटी दुकाने और कारखाने खुले हुए हैं। हवेली के एक हिस्से में एक गर्ल्स स्कूल है। हवेली के परिसर में कई अवैध बहुमंजिला इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। देखभाल के अभाव में हवेली के दरवाजों, खिडकियों और झरोखों में जंग लग चुका है। अब सिर्फ महल की कुछ बाहरी दीवारें, लाल कोटा सैंडस्टोन से मुगलिया शैली में बना प्रवेश द्वार और लोहा एवं लकड़ी के नक्काशीदार दरवाज़े ही बचे हैं जिन्हें देखकर इस इमारत के महल होने का अहसास होता है।

बेगम जीनत महल की हवेली के गेट को हेरिटेज का दर्ज़ा ज़रूर हासिल है, लेकिन यह दर्ज़ा सिर्फ कागज़ पर ही है। हवेली पर चौतरफा कब्जे के प्रति भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण , दिल्ली पुरातत्व विभाग और दिल्ली प्रशासन पूरी तरह से उदासीन है। यहां संगठित अतिक्रमंकारियों का खौफ़ इतना है कि अगर भूले भटके कोई पर्यटक हवेली को देखने आ भी गया तो उसे हवेली के भीतर जाने की हिम्मत नहीं होती। कुछ स्थानीय लोग और पुरातत्व प्रेमी बेगम की हवेली को अतिक्रमण से मुक्त कराकर उसका पुराना गौरव लौटाने को प्रयत्नशील जरुर है, मगर अतिक्रमण के इतने बड़े दायरे को देखते हुए कोई उम्मीद नहीं बंधती।

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