देवभूमि हिमाचल का प्रसिद्ध ज्वाला देवी मंदिर आज भी विज्ञान के लिए पहेली बना

देवभूमि हिमाचल का प्रसिद्ध ज्वाला देवी मंदिर आज भी विज्ञान के लिए पहेली बना हुआ है। ज्वालामुखी मंदिर में सालों से जल रही प्राकृति ज्योत आज भी वैज्ञानिकों के लिए रहस्य बनी हुई है।

पिछले 55 सालों से ONGC के वैज्ञानिक इस इलाके में सैकड़ों मीटर तक खुदाई कर चुके हैं। बकायदा पूरे इलाके का चप्पा-चप्पा छाना जा चुका है, लेकिन यहां कहीं भी गैस और तेल के अंश नहीं मिले।

 

इस रहस्य से पर्दा उठाने के लिए ONGC ने एक बार फिर यहां खुदाई का काम शुरू करने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि ज्वालामुखी मंदिर के चंगर क्षेत्र सुराणी में एक ONGC ने तेल व गैस को खोजने की कवायद शुरू की है। ONGC ने यहां तेल व गैस खोजने की जिम्मेदारी राजस्थान व दिल्ली की कंपनी दीपक इंडस्ट्रीज को सौंपी है। दीपक इंडस्ट्रीज ने जिम्मेदारी मिलने के साथ ही अपनी मशीनरी सुराणी में पहुंचा दी है।

 

सुराणी पंचायत के पूर्व प्रधान प्रताप सिंह राणा ने कहा कि इस बार जो मशीनरी आई है वह आधुनिक किस्म की है जो धरती के काफी अंदर तक तेल व गैस की खोज में मददगार साबित होगी। सुराणी में पांचवी बार कुआं खोदा जा रहा है। इस बार कंपनी जिन ड्रिलिंग मशीनों को असेंबल कर रही है वह जमीन के नीचे 8000 मीटर तक खुदाई करने में सक्षम है। ONGC लगभग 55 सालों से यहां के विभिन्न स्थानों पर मशीनें लगाकर तेल की खोज के प्रयास कर चुकी है लेकिन अभी तक सफलता नहीं मिली है।

 

1959 में पहली बार खोदा गया था कुआं : 1959 से ONGC ने ज्वालामुखी व इसके आसपास के क्षेत्रों में कुएं खोदकर इस कार्य में जुटी हुई है। ज्वालामुखी के टेढ़ा मंदिर में 1959 में पहली बार कुआं खोदा गया था। उसके बाद 1965 में सुराणी में, बग्गी, बंडोल, घीणा, लंज, सुराणी व कालीधार के जंगलों में खुदाई की गई थी।

 

गौरतलब है कि ज्वालामुखी मंदिर को जोतां वाली का मंदिर भी कहा जाता है। धर्म ग्रंथों के अनुसार ज्वालामुखी मंदिर को खोजने का श्रेय पांडवों को जाता है। इसकी गिनती माता की प्रमुख शक्ति पीठों में होती है। ऐसी मान्यता है कि यहां देवी सती की जीभ गिरी थी। यह मंदिर माता के अन्य मंदिरों की तुलना में अनोखा है क्योंकि यहां पर किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है बल्कि पृथ्वी के गर्भ से निकल रही 9 ज्वालाओं की पूजा होती है।

 

यहां पर पृथ्वी के गर्भ से 9 अलग अलग जगह से ज्वालाएं निकल रही हैं जिसके ऊपर ही मंदिर बना दिया गया है। इन 9 ज्योतियों को महाकाली, अन्नपूर्णा, चंडी, हिंगलाज, विंध्यवासिनी, महालक्ष्मी, सरस्वती, अंबिका, अंजीदेवी के नाम से जाना जाता है। इस मंदिर का प्राथमिक निर्माण राजा भूमि चंद ने करवाया था। बाद में पंजाब के महाराजा रणजीत सिंह और हिमाचल के राजा संसारचंद ने 1835 में इस मंदिर का पूर्ण निर्माण कराया।

 

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