पीरियड्स के बहाने क्या स्त्रियों को मंदिर जाने से रोकना सही है

क्या यह खून इतना गन्दा होता है कि भगवान भी डर जाये. मेरी बहुत सी महिला मित्र है, जो कभी कभी छोटी छोटी बातों पर नाराज हो जाती हैं, अजीब व्यवहार करती है. वह उस स्थिति मे बता देती है कि मेरे अभी पीरियड्स चल रहे है तो मैं नॉर्मल नही रह पा रही हूँ. तुम्हारे सामने बहुत सी महिलाएं है जो घर से बाहर काम करती है, इस दौरान उन्हें बहुत सी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है. सरकारी महिला कर्मचारियों को इस कारण महीने में 2 दिन का विशेष अवकाश मिलता है, जो वह पीरियड्स के दौरान लेती है.

मुद्दा यह है कि देश के अधिकतर मंदिरों में महिलाओं के जाने पर रोक नही है और कोई देखकर बोल भी नही सकता कि तुम्हारा पीरियड चल रहा है तो तुम अंदर नही जा सकती हो. सीधी सी बात है, कोई भी महिला इस दौरान खुद मंदिर तो क्या बल्कि किसी भी विशेष जगह जाना पसन्द नही करती है. यहां तक कि उस दौरान पुरुषों का संसर्ग भी नही चाहती हैं, तो फिर इस पर नियम बनाना निहायत बेवकूफी है.

कुछ लोग तर्क दे रहे है की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश करते समय दिक्कत होगी. 41 दिन का जो मंदिर जाने के पहले व्रत होता है उसको नही कर पायेगी. हद्द है यार ट्रस्ट की कमाई बेहिसाब है मक्का मदीना के बाद सबसे ज्यादा भक्त यही जाते है. महिलाओं के लिये व्यवस्था करो ताकि पीरियड्स के दौरान वह खुद को स्वच्छ रखे. अगर श्रद्धा और भक्ति है तो उन्हें जाने देना चाहिये वह तप करके अपनी काबलियत दिखा सकती है, उन्हें एक मौका तो दीजिये.

महिलाएं हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है. बहुत से मिथकों को तोड़ा है उन्होंने शिक्षा, सेवा, रक्षा, खेल से लेकर हर क्षेत्र में बेटों की तरह गर्वानुभूति करवा रही है. पीरियड्स प्राकृतिक अवस्था है, यह हमपर निर्भर करता है कि हम उन्हें मौका दे या यूं ही अपने विचारों को उनपर थोपे. वास्तव में हर चीज का विकल्प होता है, लेकिन हम किसी को मौका देने के बदले उन्हें उनकी कमजोरी का एहसास दिलाते रहे हैं.

बाकी रेहाना फातिमा और अन्य लोग जो इस मौके का उपयोग धर्म और संस्कृति के अपमान के लिये करना चाहते है, यह बिल्कुल गलत है. उन्हें ऐसा मौका नही मिलना चाहिये, मंदिर बोर्ड और पब्लिक के निर्णय से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश हेतु उपायों पर चर्चा होनी चाहिये. देश, काल, परिस्थिति के अनुसार धर्म के नियमो में परिवर्तन होते आये है और होने भी चाहिये.

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