Old Story : स्वतंत्रता संग्राम के साक्षी इमारतों को संरक्षित करना भूल गयी बिहार सरकार

स्वतंत्रता की 71 वीं वर्षगांठ मनाने की तयारी पूरे देश में चल रह है। हर बार ऐसे मौकों पर ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित करने की बात खूब होती है। स्वतंत्रता संग्राम के साक्षी इमारतों में बिहार के दरभंगा जिला मुख्यालय के नेशनल स्कूल का नाम शान से लिया जाता है। यहां आजादी की लड़ाई की न सिर्फ कई कहानियां दफन हैं, बल्कि सामाजिक कुरीतियों को दूर करने की मुहिम का भी गवाह है। महात्मा गांधी के आह्वान पर यहीं पं. रामनंदन मिश्र की पत्नी ने पर्दा प्रथा से अपने को मुक्त कर नारी चेतना का शंखनाद किया था। 27 वर्षों तक यह स्वतंत्रता संग्राम का केंद्र ¨बदु बना रहा। वर्तमान में यह न सिर्फ उपेक्षित है, बल्कि पूरी तरह खंडहर में तब्दील हो चुका है। अब तो हर कोई इस भूलता जा रहा है।


सर्वोदयी नेता व स्वतंत्रता सेनानी कमलेश्वरी चरण सिन्हा के नेतृत्व में समाज को शिक्षित करने व राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने के उद्देश्य से 1920 में नेशनल स्कूल की स्थापना हुई थी। शहर के मध्य भाग में लालबाग मोहल्ले में स्थित इस विद्यालय का संचालन 1924 में बंद हो गया और इसके स्थान पर स्वतंत्रता सेनानियों का केंद्र स्थल बन गया। उस समय के महान सेनानियों की आवाजाही जारी रही।

1927 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने अनाथालय की आधारशिला रखी थी। वह शिलापट्ट आज भी इसका गवाह भर बनकर विद्यमान है। फिर 1934 में भूकंप के बाद भवन के जीर्णोद्धार के लिए शिलापट्ट लगाया गया था। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महात्मा गांधी ने यहीं पर्दा प्रथा समाप्त करने की अपील की तो पं.रामनंदन मिश्र आगे आए और उनकी पत्नी पर्दा प्रथा से मुक्त होकर संग्राम में आगे आईं।
स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कई बार डॉ.राजेंद्र प्रसाद का यहां आना-जाना हुआ। फिर राष्ट्रपति बनने के बाद भी दो बार डॉ.प्रसाद यहां आए। 1955 में कमलेश्वरी चरण सिन्हा के निधन पर भी डॉ.प्रसाद, लोकनायक जयप्रकाश नारायण समेत उस समय की कई बड़ी हस्तियां मौजूद थीं।


विधान परिषद में डॉ.विनोद कुमार चौधरी द्वारा इसके जीर्णोद्धार का मामला उठाए जाने के बाद सरकार ने इसके जीर्णोद्धार व संरक्षित करने की घोषणा की थी। तत्कालीन कला व संस्कृति मंत्री सुखदा पांडेय भी इसका जायजा ले चुकी हैं। लेकिन, परिणाम सिफर रहा।
जानकारों की अनुसार इस नेशनल स्कूल में रह कर कई छात्र शिक्षा ग्रहण करते थे। इनमें से कई ने देश के साथ-साथ विश्व भर में अपनी पहचान बनाई। इनमें नेपाल के पूर्व पीएम मातृका प्रसाद कोइराला एवं गिरीजा प्रसाद कोइराला, सूरज नारायण सिंह का नाम शामिल है। इतना ही नही समाजिक विचारधारा को विश्व भर में अलग रूप देने वाले बिहार के पूर्व सीएम कर्पूरी ठाकुर ने भी यहां शिक्षा प्राप्त की है।
स्थानीय अमरेश्वरी चरण सिन्हा कहते हैं कि स्वतंत्रता संग्राम का ऐतिहासिक केंद्र उपेक्षित है। सेनानियों की स्मृतियों को अपने में समेटने वाले इस नेशनल स्कूल को लोग भूल रहे हैं। यह काफी दुखद है।

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