पत्नी ने कह दी ऐसी बात, धन छोड़कर बन गए साधु…..

प्राचीनकाल की बात है इषुकार नगर में इषुकार नाम के राजा का राज था। इसी नगर के राजपुरोहित भृगु ने पत्नी और 2 पुत्रों के साथ वैराग्य धारण कर वन में जाना तय किया। उनके पास अपार धन-सम्पदा थी।

परिवार में और कोई नहीं था। वह अपनी धन-सम्पदा राजा को देना चाहते थे। राजा के पास समाचार पहुंचा। राजा प्रसन्न हुआ और उसने अपने राज्य कर्मचारियों को आदेश दिया कि भृगु पुरोहित की सारी सम्पति राजकीय कोष में जमा करवा दी जाए।
महारानी कमलावती को जब पता चला कि भृगु पुरोहित अपार सम्पत्ति को छोड़कर साधु बन रहे हैं और राजा उनकी संपत्ति से अपना राजकोष बढ़ा रहे हैं तो उनका मन ग्लानि से भर गया। वह बेचैन होकर राजा से बोली, ‘‘राजन! आप क्या कर रहे हैं?’’

राजा ने जवाब दिया, ‘‘भंडार भर रहा हूं।’’

रानी ने फिर प्रश्न किया, ‘‘कैसे?’’

राजा ने कहा, ‘‘पुरोहित का परिवार सम्पत्ति छोड़कर साधु बन रहा है।’’

उनकी सम्पत्ति का कोई उत्तराधिकारी नहीं है इसलिए उस पर हमारा अधिकार हो गया है। यह सुनकर महारानी बोली, ‘‘राजन! पुरोहित सम्पत्ति को छोड़ रहे हैं और आप उसे बटोर रहे हैं?

दूसरी बात पुरोहित के पास सम्पत्ति आई कहां से? आपने दान-दक्षिणा में जो कुछ दिया वही तो उनके पास है। क्या दी हुई सम्पत्ति को वापस लेना आपके लिए श्रेयस्कर है? वैसे तो आपको भी वैराग्य की भावना से प्रेरित होकर स्वयं राजपाट छोड़कर संन्यासी बन जाना चाहिए। यदि आप अपने को इसमें असमर्थ समझते हैं तो उस धन को अपने राजकोष या अपने भोग विलास में न लगाकर उसे गरीबों में बांट देना चाहिए।’’

महारानी कमलावती के शब्दों ने राजा इषुकार को झकझोर दिया। राजा ने भी राज्य-वैभव छोड़कर साधु बनने का निर्णय किया। भोग के पथ को छोड़कर त्याग के महान  पथ पर अग्रसर होते हुए महाराज इषुकार भी साधु बन गए।

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