72 तक जा सकता है रुपया, खाने-पीने की चीजों से लेकर पेट्रोल-डीजल की बढ़ सकती है महंगाई

डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट मंगलवार को आल टाइम लो पर पहुंच गई. रुपये ने 70.08 का रिकॉर्ड निचला स्तर टच किया. (Reuters)

डॉलर के मुकाबले रुपये की गिरावट मंगलवार को आॅल टाइम लो पर आ गया. रुपये ने 70.08 का रिकॉर्ड निचला स्तर टच किया. करंसी मार्केट एक्सपर्ट का मानना है कि डॉलर इंडेक्स में मजबूती, जियो पॉलिटिकल टेंशन, अमेरिकी अर्थव्यवस्था में सुधार के अलावा घरेलू स्तर पर कम जीएसटी कलेक्शन, चालू खाता घाटा में बढ़ोत्तरी जैसी वजहों के चलते रुपया कमजोर हो रहा है. एक्सपर्ट मानते हैं कि रुपया इस साल आखिर तक 72 के लेवल तक जा सकता है.

अमेरिका और तुर्की के बीच तनाव बढ़ने का असर ग्लोबल फाइनेंशियल मार्केट्स पर प्रभाव पड़ा. इसके चलते घरेलू बाजार भी दबाव में रहे. तुर्की की करंसी लीरा में इस साल करीब 40 फीसदी की गिरावट आ चुकी है. इसका असर सोमवार को भी भारतीय रुपये पर पड़ा और वह रिकॉर्ड 69.92 के स्तर पर बंद हुआ था.

इस साल 8% से ज्यादा कमजोर हुआ रुपया 
केडिया कमोडिटी के डायरेक्टर अजय केडिया का कहना है कि रुपया इस साल जनवरी से अबतक 8.74 फीसदी तक टूट चुका है. इस साल के आखिर तक रुपया डॉलर के मुकाबले 72 के स्तर तक जा सकता है.

क्यों कमजोर हो रहा है रुपया?

प्री-इलेक्शन ईयर
केडिया का कहना है कि बीते कुछ सालों से यह ट्रेंड सामने आ रहा है कि प्री-इलेक्शन ईयर में रुपया डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है. 2014 के चुनाव से पहले भी ऐसा देखने को मिला था.

डॉलर इंडेक्स में मजबूती
केडिया का कहना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में लगातार सुधार हो रहा है. अमेरिकी सेंट्रल बैंक फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर रहा है. इसके चलते डॉलर इंडेक्स में लगातार मजबूती आ रही है. इस साल अब तक डॉलर इंडेक्स करीब 4.12 फीसदी तक मजबूत हो गया है. जिसके चलते रुपये में दूसरी इमर्जिंग यानी उभरती अर्थव्यवस्थाओं की करंसी पर लगातार दबाव बढ़ रहा है.

जियो पॉलिटिकल टेंशन
केडिया का कहना है कि दुनिया में जियो पॉलिटिकल टेंशन के चलते डॉलर को सपोर्ट मिल रहा है. इस साल अमेरिका-नॉर्थ कोरिया के बीच टेंशन बढ़ने, ईरान के साथ न्यूक्लियर करार से अमेरिका के बाहर निकले के बाद चीन-अमेरिका के बीच ट्रेड वार और अब तुर्की के आर्थिक संकट के चलते वैश्विक अनिश्चतता बढ़ी है. इससे डॉलर इंडेक्स को मजबूती मिल रहा है. डॉलर इंडेक्स में पिछले छह महीने से तेजी बनी हुई है. तुर्की की करंसी लीरा 17 फीसदी तक टूट गई है.

GST कलेक्शन और CAD
केडिया ने बताया कि सरकार का जीएसटी कलेक्शन सिर्फ एक बार 1 लाख करोड़ रुपये के पार गया है. ऐसे में जीएसटी से रेवेन्यू अभी भी उम्मीद के अनुरूप नहीं है. वहीं, फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोत्तरी से सरकारी खजाने पर अतिरिक्त खर्च बढ़ेगा. इससे सरकार का घाटा बढ़ना तय है. यानी, करंट अकाउंट डेफिसिट (CAD) बढ़ने से रुपये पर दबाव बढ़ेगा. सरकार का चालू खाता घाटा 2.6 फीसदी पर पहुंच गया है

रुपये में गिरावट का क्या होगा असर: 

भड़क सकती है महंगाई
रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर को छू चुका है और आगे इसे करीब 4 फीसदी और टूटने की आशंका जताई जा रही है. ऐसे में कमजोर रुपये का असर सरकार की बैलेंसशीट के साथ-साथ आम आदमी की जेब पर भी पड़ना तय है.

बढ़ सकती हैं पेट्रोल-डीजल की कीमतें
डॉलर के मुकाबले रुपये के 70 के स्तर पर पहुंचने का बड़ा असर क्रूड यानी कच्चे तेल के आयात पर हुआ है. भारत अपनी जरूरत का 80 फीसदी से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है. ऐसे में यदि कच्चे तेल का आयात महंगा होगा, निश्चित तौर पर आॅयल मार्केटिंग कंपनियां पेट्रोल-डीजल की कीमतों पर अग्रेसिव रूख अपना सकती है. यानी पेट्रोल-डीजल की महंगाई आने वाले दिनों में बढ़ सकती है.

खाने-पीने के चीजों की बढ़ सकती है महंगाई
देश में करीब लगभग 90 फीसदी से इससे ज्यादा खाने-पीने की चीजों और दूसरे जरूरी सामानों के ट्रांसपोर्टेशन के लिए डीजल का इस्तेमाल होता है. ऐसे में डीजल महंगा होते ही इन सारी जरूरी चीजों के दाम बढ़ेगा. वहीं, खाद्य तेल भी महंगे होगे. देश में करीब 1 एक लाख टन खाद्य तेल का हर साल आयात होता है.

कार समेत TV, फ्रिज के बढ़ सकते हैं दाम
रुपये में गिरावट बनी रही तो कार कंपनियां आगे कीमतें बढ़ाने पर विचार कर सकती हैं.  मारुति सुजुकी, टोयोटा, हुंडई समेत कई कार कंपनियां कुछ कल-पुर्जे विदेश से आयात करती हैं. ऐसे में कलपुर्जों का आयात महंगा होने से कारों की कीमत बढ़ाना कंपनियों की मजबूरी बर सकती है. दूसरी ओर, रुपये के कमजोर होने से अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक प्रोडक्ट्स की कीमतों में तेजी आ सकती है. इसमें टेलीविजन, फ्रिज, डिजिटल कैमरा, डेस्कटॉप कंप्यूटर्स, लैपटॉप और अन्य सभी इलेक्ट्रानिक उत्पाद शामिल हैं. अधिकांश इलेक्ट्रॉनिक कंपनियां एसेक्सरीज और कई जरूरी पाट्र्स आयात करती हैं. ऐसे में आयात महंगा होने से उनके फाइनल प्रोडक्ट की कीमतें बढ़ सकती हैं.

विदेशी कर्ज हो जाएगा महंगा
रुपये की कमजोरी से कॉरपोरेट हाउसेस के लिए भी विदेशी कर्ज लेना महंगा हो जाएगा. रिटेल से लेकर रीयल्टी सेक्टर काफी हद तक विदेशी कर्ज पर निर्भर है. इसे तकनीकी भाषा में वाणिज्यिक विदेशी कर्ज (ECB) कहते हैं. इसके तहत भारतीय कंपनियां, सीधे तौर पर कम ब्याज दरों में विदेशी कंपनियों से कर्ज ले सकती है. रुपये में गिरावट से विदेशी कर्ज महंगा हो जाएगा. कर्ज के बदले कंपनियों को ब्याज का भुगतान डॉलर में देना पड़ता है. जब एक डॉलर खरीदने के लिये कंपनियों को 70 रुपये या इससे ज्यादा देना होगा तो उनको पहले की तुलना में ज्यादा ब्याज चुकाना होगा. कर्ज महंगा होगा तो लागत बढ़ेगी. लागत बढ़ेगी तो वस्तुओं की कीमतों में इजाफा होगा.

निर्यातकों को हो सकता है फायदा
रुपये की कमजोरी से जहां आयातकों को दबाव झेलने को मिल सकता है, वहीं इसका फायदा निर्यातकों को होगा. डॉलर के मजबूत होने के बाद विदेशों से भारत में पैसा मंगाना फायदेमंद होगा. अब 1 डॉलर पर भारतीय निर्यातकों को 70 रुपये के आस-पास मिल रहे हैं. वहीं जिन भारतीयों के परिचित विदेशों से यहां पैसा भेजते हैं, उन भारतीयों को सबसे ज्यादा मुनाफा मिलेगा.

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