सरकार की नाक के नीचे कैसे चल रहे हैं फ़र्ज़ी इंजीनियरिंग कॉलेज?

सभी के माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे अच्छी उच्च शिक्षा हासिल कर बड़े अफ़सर बनें, देश के विकास में योगदान दें। लेकिन तब बड़ी कोफ़्त होती है, जब पता चलता है कि देश में नीचे से लेकर उच्च शिक्षा तक बड़े पैमाने पर धांधली चल रही है। युवा बड़े-बड़े सपने लेकर चमक-दमक वाले कॉलेजों में दाख़िले लेते हैं। मुंहमांगी फ़ीस का इंतज़ाम करते हैं उनके माता-पिता। युवा जी-जान लगाकर पढ़ते हैं, डिग्री हासिल करते हैं और जब नौकरी के लिए कहीं आवेदन करते हैं, तब पता चलता है कि डिग्री को फ़र्ज़ी है।

लोकसभा में लिखित सवाल के जवाब में केंद्रीय मानव संसाधन विकास राज्य मंत्री सत्यपाल सिंह ने बताया कि देश में 277 इंजीनियरिंग कॉलेज वैध नहीं हैं। ये ऐसे कॉलेज हैं, जिन्हें ऑल इंडिया काउंसिल फ़ार टेक्नीकल एजूकेशन यानी एआईसीटीई की मंज़ूरी नहीं मिल पाई है। हैरत की बात है कि ऐसे सबसे ज़्यादा 66 कॉलेज देश की राजधानी दिल्ली में चल रहे हैं। इसके अलावा तेलंगाना में 35, पश्चिम बंगाल में 27, कर्नाटक में 23, सबसे बड़े प्रदेश उत्तर प्रदेश में 22, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में 18-18, बिहार में 17, महाराष्ट्र में 16, तमिलनाडु में 11, गुजरात में आठ, आंध्र प्रदेश में सात, पंजाब में पांच, राजस्थान में और उत्तराखंड में तीन-तीन फ़र्ज़ी इंजीनियरिंग कॉलेज नौजवानों की उम्मीदें तोड़ रहे हैं।

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सरकार के मुताबिक़ इन सभी कॉलेजों से वैधता की मंज़ूरी लेने को कहा गया है। अगर ये तय प्रक्रिया पूरी नहीं करते, तो इन्हें बंद कर दिया जाएगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर इन्हें मंज़ूरी नहीं मिली है, तो फिर इनमें पढ़ाई कैसे कराई जा रही है? जब इनकी डिग्री वैध नहीं हैं, तो फिर ये आलीशान बिल्डिंगों में तमाम तामझाम के साथ चल क्यों रहे हैं? ऐसे इंजीनियरिंग कॉलेजों के मैनेजमेंट को क्या सज़ा दी जाएगी? ये कॉलेज अगर बंद हो गए, तो इनमें पढ़ने वाले सैकड़ों युवाओं का भविष्य बर्बाद होगा, ये तो तय है, लेकिन मोटी फ़ीस वसूलने वाले मैंनेजमेंट के ख़िलाफ़ क्या कार्रवाई की जाएगी, ये कौन तय करेगा?

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