शांति दूत हैं प्रोफेसर अजय, दर्जनों नक्सलियों के हृदय परिवर्तन के बाद अब पत्थरबाजों को देंगे अमन का पैगाम

भारत में इन दिनों धर्म और संप्रदाय के नाम पर लोगों को बांटना काफी आसान काम है और लोग इसी बात का फायदा उठाकर लोगों को गुमराह करने में लगे हुए हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि कुछ युवक जहां कश्मीर में आतंक के रास्ते पर चलने लगते हैं, तो वहीं बिहार और छत्तीसगढ़ से लगे इलाकों में युवा नक्सली बन जाते हैं। इन रास्तों पर जाने के बाद इन युवकों को वापस अच्छाई के रास्ते पर लाना काफी मुश्किल होता है लेकिन हमारे देश में एक प्रोफेसर ऐसा भी है, जो यह मानता है कि इन युवकों को शांति का पाठ पढ़ा कर वापस अच्छाई के रास्ते पर लाया जा सकता है।

दरअसल बिहार के शेखपुरा के रहने वाले प्रोफेसर अजय का मानना है कि वे जब नक्सलियों को समझाकर शांति का पाठ पढ़ा सकते हैं, तो पत्थरबाजों को क्यों नहीं समझाया जा सकता है। बताते चलें कि शेखपुरा के संजय गांधी स्मारक महिला कॉलेज में प्रोफेसर अजय पिछले 12 सालों से नक्सलियों को सुधारने के कार्य में लगे हुए हैं और वे इस कार्य के चलते नक्सलियों के गढ़ में जाकर उन्हें महापुरुषों के सत्य और अहिंसा के पाठ पढ़ाते हैं। इस कार्य को वे साल 2006 से कर रहे हैं।

उन्होंने बिहार, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और झारखंड के कई इलाकों में कैंप लगाकर कई नक्सलियों को मुख्याधारा में लौटाने का सराहनीय प्रयास किया है। वहीं अब वे नक्सलियों को सुधारने के बाद कश्मीर के पत्थरबाजों को भी इसी तरह अच्छाई के रास्ते पर लाएंगे। प्रोफेसर अजय का मानना है कि कश्मीर की स्थिति काफी चिंताजनक है और वे यहां पर गुमराह हुए युवकों को वापस मुख्यधारा में लौटाना चाहते हैं। इसके लिए वे कश्मीर के आतंक प्रभावित जिलों में जाकर वहां के युवकों को हिंसा का रास्ता छोड़ने के लिए प्रेरित करेंगे।

इस तरह से हुई इस नेक काम की शुरुआत

प्रोफेसर अजय का कहना है कि उन्होंने इस काम की शुरुआत स्वामी विवेकानंद के जीवन से प्रभावित होकर की थी। उन्होंने साल 2002 में स्वामी विवेकानंद की कई पुस्तकों का अध्ययन किया और साल 2006 से इस काम की शुरुआत कर दी। उन्होंने बताया कि इस कार्य के दौरान उन्हें कई बार धमकियां भी मिलीं और कई बाधाएं भी आईं लेकिन वे बिना डरे और बिना रुके इस मार्ग पर चलते रहे। इसका नतीजा यह हुआ कि उनकी बातों से प्रभावित होकर कई नक्सली युवाओं ने हिंसा का रास्ता छोड़ दिया और अच्छाई के रास्ते पर लौट आए। उन्होंने बताया कि साल 2007 में उन्हें एक नक्सली ने फोन पर बुरा अंजाम भुगतने की धमकी भी दी थी।

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