भाजपा से रिश्ता तोड़ने पर उतारू है शिवसेना, किसको होगा फायदा और कौन उठाएगा नुकसान

दशकों तक भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी रही शिवसेना अब राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से अलग होने की धमकी दे रही है। 2019 के लोकसभा चुनावों और उसके बाद होने वाले महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों को देखते हुए भाजपा इसे हल्के में नहीं ले सकती। शायद यही वजह है कि भगवा दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने महाराष्ट्र में अपने कार्यकर्ताओं को अकेले चुनाव लड़ने के लिए तैयार रहने को कह दिया है। लेकिन सवाल उठता है कि क्या शिवसेना एनडीए छोड़कर चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर पाएगी।

दबाव बनाने की रणनीति

कुछ राजनीतिक जानकारों का मानना है कि शिवसेना अंत में भाजपा के साथ ही आएगी। वह सिर्फ दबाव की रणनीति बना रही है ताकि लोकसभा और विधानसभा चुनावों में अपने लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें मांग सके। यदि यह बात सच है तो भी इससे बड़ा घाटा शिवसेना का ही होगा। बाला साहब ठाकरे के जमाने में पार्टी की इमेज ऐसी थी कि एक बार जो कह दिया सो कह दिया। उद्धव के नेतृत्व में पार्टी में वह धार नहीं रही है। ऐसे में उद्धव को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा।

शिवसेना अलग से लड़ी तो क्या होगा

भाजपा और शिवसेना यदि दोनों अलग-अलग चुनावी मैदान में उतरती हैं तो इससे निश्चित रूप से कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस गठबंधन को फायदा हो सकता है। जहां तक भाजपा का सवाल है, तो वह भी पिछले चुनावों को प्रदर्शन को देखते हुए सम्मानजनक संख्या में सीटें जीत सकती है। शिवसेना के लिए अलग होना इसलिए अच्छा नहीं रहेगा क्योंकि उसमें पहले वाली धार नहीं दिखती। यदि उद्धव अपने कार्यकर्ताओं में एक बार फिर से जोश भरें तो यह पार्टी अकेले भी अच्छा प्रदर्शन कर सकती है।

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