राजनीति की दुनिया में हमेशा ‘सुपरहिट’ रहे करुणानिधि

डीएमके प्रमुख और दक्षिण भारत के दिग्गज नेता एम करुणानिधि (M Karunanidhi) का निधन हो गया है. सिर्फ 14 साल की उम्र में दक्षिण भारत की सियासत में करुणानिधि ने जो ‘लकीर’ खींची शायद अब उससे बड़ी लकीर खींचना मुश्किल होगा. राजनीति में करुणानिधि (Karunanidhi) की एंट्री का किस्सा भी दिलचस्प है. इसकी शुरुआत हुई ‘हिंदी-हटाओ आंदोलन’ से. वर्ष 1937 में हिंदी भाषा को स्कूलों में अनिवार्य भाषा की तरह लाया गया और दक्षिण में इसका विरोध शुरू हो गया. किशोर करुणानिधि ने भी इसकी खिलाफत शुरू कर दी.

कलम को हथियार बनाते हुए हिंदी को अनिवार्य बनाए जाने के विरोध में जमकर लिखा. हिंदी के विरोध में और लोगों के साथ रेल की पटरियों पर लेट गए और यहीं से उन्हें पहचान मिली. हिंदी विरोधी आंदोलन के बाद करुणानिधि का लिखना-पढ़ना जारी रहा और 20 वर्ष की उम्र में उन्होंने तमिल फिल्म उद्योग की कंपनी ‘ज्यूपिटर पिक्चर्स’ में पटकथा लेखक के रूप में अपना करियर शुरू किया था. अपनी पहली फिल्म ‘राजकुमारी’ से ही वे लोकप्रिय हो गए. उनकी लिखीं 75 से अधिक पटकथाएं काफी लोकप्रिय हुईं.

अन्नादुराई ने प्रतिभा को पहचाना
एम. करुणानिधि (M Karunanidhi) कोयंबटूर में रहकर व्यावसायिक नाटकों और फिल्मों के लिए स्क्रिप्ट लिख रहे थे. इसी दौरान पेरियार और अन्नादुराई की नजर उन पर पड़ी. उनकी ओजस्वी भाषण कला और लेखन शैली को देखकर उन्हें पार्टी की पत्रिका ‘कुदियारासु’ का संपादक बना दिया गया. हालांकि इसके बाद 1947 में पेरियार और उनके दाहिने हाथ माने जाने वाले अन्नादुराई के बीच मतभेद हो गए और 1949 में नई पार्टी ‘द्रविड़ मुनेत्र कड़गम’यानी डीएमके की स्थापना हुई. यहां से पेरियार और अन्नादुराई के रास्ते अलग हो गए.डीएमके की स्थापना के बाद एम. करुणानिधि की अन्नादुराई के साथ नजदीकियां बढ़ती चली गईं. पार्टी की नींव मजबूत करने और पैसा जुटाने की जिम्मेदारी करुणानिधि को मिली. करुणानिधि ने इस दायित्व को बखूबी निभाया.

1969 में पहली बार मिली गद्दी
वर्ष 1957 में डीएमके पहली बार चुनावी मैदान में उतरी और विधानसभा चुनाव लड़ी. उस चुनाव में पार्टी के कुल 13 विधायक चुने गए. जिसमें करुणानिधि भी शामिल थे. इस चुनाव के बाद डीएमके की लोकप्रियता बढ़ती गई और सिर्फ 10 वर्षों के अंदर पार्टी ने पूरी राजनीति पलट दी. वर्ष 1967 के विधानसभा चुनावों में डीएमके ने पूर्ण बहुमत हासिल किया और अन्नादुराई राज्य के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने. हालांकि सत्ता संभालने के दो ही साल बाद ही वर्ष 1969 में अन्नादुराई का देहांत हो गया. अन्नादुराई की मौत के बाद करुणानिधी ‘ड्राइविंग सीट’ पर आ गए और सत्ता की कमान संभाली. वर्ष 1971 में वे दोबारा अपने दम पर जीतकर आए और मुख्यमंत्री की कुर्सी संभाली. यहां सिनेमाई हीरो एम जी रामचंद्रन उनके नए साथी बने. इसी दौरान उनकी अभिनेता एमजीआर से नजदीकी बढ़ी, लेकिन यह ज्यादा दिनों तक नहीं चला. एमजीआर ने एआईडीएमके (AIADMK) के नाम से अपनी नई पार्टी बना ली.1977 के चुनावों में एमजीआर ने करुणानिधि को करारी शिकस्त दी.

सियासत में रहे ‘अजेय’
1977 के बाद से तमिलनाडु में शह-मात का सिलसिला चलता रहा. अपने 60 साल से ज्यादा के राजनीतिक करियर में करुणानिधि पांच बार तमिलनाडु के सीएम बने. उनके नाम सबसे ज्यादा 13 बार विधायक बनने का रिकॉर्ड भी है. केंद्र में संयुक्त मोर्चा, एनडीए और यूपीए सबके साथ सरकार में उनकी पार्टी शामिल रही है.

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