आज भी यहां के घरों में होता है ये गंदा काम, सामने आई घिनौनी तस्वीर, देखकर यकीन करना हुआ मुश्किल

मारे देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुले में शौच न करने की अपील करते हैं। प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ प्रदेश को खुले में शौच से मुक्त करने की बात करते हैं, लेकिन प्रदेश में हाथ से मैला ढोने की कुप्रथा आज भी बेधड़क जारी है। जबकि सरकार का दावा है कि प्रदेश में मैला प्रथा बंद हो चुकी है। लेकिन हालही में हुए एक सर्वे की अगर मानें तो इस गंदे काम के मामले में उत्तर प्रदेश सबसे ऊपर है। राजधानी लखनऊ से सटा बाराबंकी जिला इस बात की तस्दीक करता है कि कैसे प्रशासन और अधिकारियों की संवेदनहीनता के चलते आज भी यहां शहर के कई घरों में हाथ से मैला उठाने का घिनौना काम चल रहा है।

आज भी हाथ से उठाया जाता है मैला

हम ऐसा इसलिए कह रहे हैं क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजधानी से एकदम सटे बाराबंकी जिले का एक चौंकाने वाला पहलू सामने आया है। यहां शहर के बंकी इलाके के कई घरों में आज भी हाथों से मैला ढोने की प्रथा चालू है। जो लोग टॉयलेट्स की सफाई के लिए आते हैं उन्हें जमादार कहते हैं। इनका काम सुबह तड़के शुरू हो जाता है। ये हाथ में एक टोकरी लेकर घर-घर जाती हैं। जहां ये हाथ से टॉयलेट्स की सफाई करती हैं। इनके दिन की शुरुआत लोगों के मलमूत्र को साफ करने से होती है। इन महिलाओं को मैला ढोकर जो भी रुपए मिलते हैं, इन्हीं से वे अपने परिवार का भरण पोषण करती हैं। इनका मानना है कि जिंदगी भर इन्हें अपना पेट पालने के लिए यही काम करना पड़ेगा।

पालना है परिवार का पेट

बंकी के रहने वाले शाहिद के घर पर जब हम पहुंचे तो देखा वहां आज भी एक महिला आकर अपने हाथों से मैला साफ करती है। अपने मुंह पर कपड़ा बांधकर आई इस महिला से जब हमने बात करने की कोशिश की तो उसने कुछ भी कहने से साफ इनकार कर दिया। लोगों ने बताया कि ये महिला मैला ढोने का काम करती है। सुबह 7 बजे घर से निकलती है और बंकी के लगभग एक दर्जन घरों में बने सूखे शौचालयों में जाकर हाथों से मैला उठाकर अपनी टोकरी में भरती है। उसके बाद मल से भरी टोकरी अपने सिर पर रखती है और उसे दूर फेंकने जाती है। मौहल्ले वालों के मुताबिक वह यह काम सालों से कर रही है। सिर पर मैला उठाने वाली इस महिला ने गुस्से में कहा कि मैला सिर पर उठाना कौन चाहाता है। वह यह इसलिए कर रही है क्योंकि उसके पास दूसरा काम नहीं है। अगर वह मैला ढोने का काम नहीं करेगी तो उसके परिवार का पेट कौन भरेगा।

शौचालय के लिए मांगी जाती है घूस

वहीं इन घरों के मालिक शाहिद, अली हसन और साइना जिनके घर से आज भी मैला उठाने का काम चल रहा है उनकी बात सुनकर एक बात तो साफ है कि ये लोग भी अपने घरों में शौचालय बनवाना चाहते हैं। लेकिन प्रशासन की अनदेखी और आर्थिक लाचारी के चलते वह अपने घर में शौचालय नहीं बनवा सकीं। साइना ने बताया कि उनका परिवार बहुत गरीब है। वह खुद के पैसों से अपने घर में शौचालय नहीं बनवा सकतीं। कई बार सरकारी मुलाजिमों ने शौचालय बनवाने के नाम पर उनसे फार्म भरवाए लेकिन हुआ कुछ नहीं। वहीं शाहिद ने बताया कि उन लोगों से शौचालय बनवाने के लिए रकम पास करने के नाम पर घूस की मांग की जाती है।

अधिकारियों के उड़े होश

वहीं जब हमने बाराबंकी के अपर जिलाधिकारी संदीप कुमार गुप्ता को इस बात की जानकारी दी कि हाथ से मैला ढोकर सिर पर उठाने का घिनौना और अमानवीय काम आज भी जिले में जारी है तो वह भी हैरान रह गए। उनके चेहरे के उड़े रंग इस बात की चीख-चीखकर गवाही दे रहे थे कि ये मामला कितना गंभीर है। पहले तो वह इस मामले पर बोलने से थोड़ा बचते नजर आए, लेकिन बाद में उन्होंने कहा कि स्वच्छ भारत अभियान के तहत जिन घरों में शौचालय नहीं हैं उन्हें चिन्हित करते हुए वहां शौचालय बनवाए जा रहे हैं। उसके बावजूद अगर इस तरह की बात सामने आ रही है तो तत्काल ईओ को मामले की जांच के निर्देश दिए जाएंगे। संदीप गुप्ता ने बताया कि हाथ से मैला उठाने वाले लोगों के पुनर्वास के लिए और ऐसे घर जहां पर अभी भी शुष्क शौचालय हैं वहां जल्द से जल्द शौचालय बनवाए जाएंगे। अपर जिलाधिकारी ने कहा कि ये हम सबकी जिम्मेदारी है कि हमारे आसपास इस तरह का काम न हो। ये कुप्रथा अब पूरी तरह से बंद होनी ही चाहिए।

बनाया गया कानून

मैला ढोने की मैली प्रथा अपने देश में शायद सदियों पुरानी है। आपको जानकर हैरानी होगी कि आज भी इन्हें अछूत समझा जाता है। यहां तक कि कई घरों में इनके आने जाने के लिए अलग दरवाजे होते हैं। इन्हें घरों में अपने जूते-चप्पल लाने की इजाजत नहीं होती। ये वो हैं जो अपने हाथों से मल को साफ करके अपने सिर पर रखकर ढोते हैं। सबसे ज्यादा तकलीफदेह बात ये है कि सरकार की ओर से इस काम पर रोक लगाए जाने के बावजूद भी ये काम बदस्तूर जारी है। इनकी कई पीढ़ियों ने इस काम में ही अपनी जिंदगी गुजार दी। आपको बता दें कि मैला ढोने और हाथ से टॉयलेट की सफाई को मानवीय गरिमा के खिलाफ मानते हुए पहली बार 1993 में इस पर पाबंदी के लिए कानून बनाया गया था। इसके बाद भी जब इस काम में लगे श्रमिकों की संख्या में अधिक कमी नहीं आई तो 2013 में संशोधन करते हुए राज्यों को ऐसे श्रमिकों को रोजगार देने और पुनर्वास के नियम बनाए गए, ताकि मैला ढोने वालों को विकल्प मिल सके और यह प्रथा बंद हो। इसके बाद भी हालात ज्यादा नहीं बदले हैं।

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