इस व्यक्ति के लिए जहां सरकारी सिस्टम से कोई मदद नहीं मिली,वहीं किन्नर बने भगवान…

ना जाने किस दिशा में हमारा देश आगे बढ़ रहा है। देहरादून के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल में एस्ट्रेचर नहीं मिता तो एक व्यक्ति कंधे पर भाई के शव को ले गया। इस व्यक्ति के लिए जहां सरकारी सिस्टम से कोई मदद नहीं मिली, वहीं किन्नर भगवान साबित हुए।

सरकारी अस्पताल से जब स्ट्रेचर और एंबुलेंस नहीं मिली तो किन्नरों ने पैसा देकर घर जाने के लिए एंबुलेंस उपलब्ध कराई। यूपी के बिजनौर जिले के धामपुर में फलों की ठेली लगाकर परिवार पालने वाला पंकज, टीबी से पीड़ित अपने छोटे भाई सोनू को बड़ी उम्मीद के साथ गुरुवार को दून अस्पताल लेकर पहुंचा।

इमरजेंसी वार्ड में उसने सोनू का पर्चा बनाया। श्वास एवं छाती रोग के एचओडी डॉ. रामेश्वर पांडे ने चेकअप किया और जरूरी जांचें कराने को लिखा, लेकिन उत्तराखंड का निवासी नहीं होने के कारण सोनू की मुफ्त जांचें नहीं हो पाईं। पंकज के पास सिर्फ पांच सौ रुपये थे। पैसा देकर जांच कराना संभव नहीं था। इसलिए वह भाई को लेकर बिजनौर लौटने की तैयारी कर ही रहा था कि सोनू की मौत हो गई। इसके बाद पांच सौ रुपये में कोई एंबुलेंस वाला शव धामपुर पहुंचाने के लिए नहीं मिला। इस पर बेबस पंकज भाई का शव कंधे पर रखकर धामपुर के लिए रवाना हो गया।

भाई के शव को कंधे पर रखकर वह अस्पताल से कुछ दूरी पर पहुंचा था कि उपचार के लिए अस्पताल आ रहे कुछ किन्नरों ने उसे देख लिया। किन्नरों ने इस तरह कंधे पर शव ले जाने का कारण पूछा तो पंकज बताया कि उसके पास प्राइवेट एंबुलेंस करने के रुपये नहीं हैं, और वो शव को धामपुर लेकर जा रहा है। इस पर किन्नरों ने रोका और उसे दो हजार रुपये दिए। इसके बाद वह पंकज को अस्पताल परिसर में ले गए।किन्नरों ने यहां लोगों से एक हजार रुपये चंदा एकत्र कर पंकज को दिए। किन्नरों के समझाने पर एक एंबुलेंस वाला तीन हजार रुपये में शव धामपुर पहुंचाने को तैयार हो गया। देर रात शव धामपुर पहुंचा दिया गया।

भाई की मौत के बाद शव घर ले जाने के लिए उसने कई निजी एंबुलेंस वालों से कहा। लेकिन कोई भी एंबुलेंस वाला पांच हजार रुपए से कम में शव धामपुर पहुंचाने को राजी नहीं हुआ। उसने 108 एंबुलेंस सेवा के चालक से भी मदद मांगी, लेकिन उसने कहा कि वो केवल घायलों को ले जाते हैं, शव को नहीं।

घर से चलते समय जेब में थे दो हजार रुपये 

पंकज ने बताया कि भाई को लेकर जब वह धामपुर से चला तो उसके पास दो हजार रुपए थे। बस का किराया और आक्सीजन मास्क लेने में 1500 रुपये खर्च हो गये। उसके पास केवल पांच सौ रुपये ही बचे थे।

 

अस्पताल में कई लोगों ने टाला 

छोटे भाई के शव को घर तक पहुंचाने के लिए पंकज ने अस्पताल में कई लोगों के आगे हाथ फैलाये। लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। सब उसे अपनी मजबूरी गिनाते रहे। कुछ ऐसे भी थे, जिन्होंने दो टूक कहा कि उनके लिये ये रोज की बात है। अगर वो इस तरह मदद करते रहे तो घर चलाना मुश्किल हो जायेगा। छोटे भाई की मौत के बाद शव को अस्पताल से कंधे पर घर ले जाने की घटना का संज्ञान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने लिया है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कड़ा संज्ञान लिया और सचिव स्वास्थ्य नितेश झा को जांच करने के आदेश दिये। उधर, चिकित्सा अधीक्षक डॉ. केके टम्टा ने बताया कि अस्पताल के पास इस समय लगभग  पांच स्ट्रेचर और इतने ही व्हील चेयर काम के है। बाकि टूट चुके हैं। अस्पताल प्रशासन ने लगभग दो माह पूर्व बीस स्ट्रेचर और बीस  व्हील चेयर का प्रस्ताव चिकित्सा शिक्षा विभाग को भेजा था। जिसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

 

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