वो कैसे आई कभी सोचा है…जिसे देखकर मुंह में पानी आ जाता है

बिरयानी फारसी शब्द बीरियन से ली गई है, जिसका अर्थ है ‘खाना पकाने से पहले फ्राई हुआ’ और चावल के लिए फारसी शब्द बिरिनज। जबकि बिरयानी ने भारत के लिए अपना रास्ता कैसे बनाया है, इस बारे में कई सिद्धांत हैं, लेकिन ज्यादातर यह स्वीकार किया जाता है कि इसका जन्म पश्चिम एशिया में हुआ था।

कहते हैं, 1938 में तुर्क-मंगोल, तिमुर भारत के सीमावर्ती इलाकों में पहुंचे जब उन्होंने इसकी शुरूआत की। तिमुर आर्मी ने बड़े पॉट में भरकर चावल बनाए। उसमे तमाम प्रकार के समाग्री डाली और जैसा भी मीट मिला उसको बनाने लगे। वहीं बिरयानी सबसे पहले योद्धाओं को खिलाई गई।  इसके अलावा, एक और यौद्धा इस डिश को अरब ट्रेडर्स से भारत के मालाबार तट लेकर आए। उनका भारत का रोज का चक्कर था।तमिल साहित्य में ओन सोरू के नाम से जाना जाने वाला चावल  घी, मांस, हल्दी, धनिया, काली मिर्च, और बे पत्ती से बनाते थे।  इसे सैन्य यौद्धाओं को खिलाने के लिए इस्तेमाल किया जाता था।

भारत में हैदराबाद के निजाम और लखनऊ के नवाब भी बिरयानी की सूक्ष्म बारीकियों की सराहना के लिए प्रसिद्ध थे। उनके शेफ अपने व्यंजनों के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध थे। इन्हीं शासकों की वजह से आज बिरयानी देश के विभिन्न हिस्सों में अपने संस्करणों की वजह से लोकप्रिय है। बिरयानी की शुरूआत कई दशक पहले चुकी है। इसको खाने से लेकर बनाने तक की विधि में कई बदलाव देखने को मिले है। आज हम उन बिरयानी को जिक्र करेंगे जिनके नाम शायद आपको भी मालूम नहीं होगा।

1. मुगलई बिरयानी- मुगल शासक खाने के काफी शौकीन थे। उनके खानों के लिस्ट में कई प्रकार के लेविश डिश की दमक देखने को मिलती थी। उन्हीं में से एक नाम बिरयानी का भी था। इस बिरयानी का स्वाद भी रॉयल होता है।

2. हैदराबादी बिरयानी – विश्व प्रसिद्ध हैदराबादई बिरयानी तब चर्चा में आई जब सम्राट औरंगजेब ने हैदराबाद के नए शासक के रूप में निजा-उल-मुल्क नियुक्त किया था। उनके शेफ ने 50 से ज्यादा प्रकार के बिरयानी बना दी। ज्यादातर बिरयानी का स्वाद मीट से आता था।

3.लखनऊ बिरयानी – इसे शाही अवधी शैली में पकाया जाता है। लखनऊ बिरयानी के बनावट नरम होते हैं और मसाले हल्के होते हैं।इसको बनाने का पहला तरीका हल्के आंच में दो-तीन घंटे गरम करना होता है। इसी वजह से लखनऊ की बिरयानी काफी स्वादिष्ट होती है।
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